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राम का नाम

06 Oct 2018 Comments: 0 Views: 
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Ravi-Kumar-Sinha
Posted by Ravi-Kumar-Sinha
धर्म अगर अफीम है, तो पीते सबसे ज्यादा भारतीय ही हैं. इतना बड़ा देश, 130 से ज्यादा करोड़ लोग, विश्व के सभी धर्मो का निवास, और सबसे बड़ी बात धर्म और राजनीति का घाल-मेल, ये सभी मिलकर ऐसा वातावरण पैदा करते हैं जिसमें समाज के बिखरने की पूरी संभावना होती है. आजादी के बाद से समाज में सद्भाव कम और बिखराव ज्यादा देखने को मिला है. हालिया कुछ वर्षों में ये बिखराव का आग तेजी से बढ़ रहा है और इसे हमारे रहनुमा, हमारे नेता जानते भी है मगर वो इसे कभी बुझाने की कोशिश नहीं करते है बल्कि गाहे-बगाहे इसमें घी डालते रहते है ताकि उनका हित सधता रहे. सत्ता की सीढियों पर चढ़ने में कोई परेशानी न हो. पार्टी चाहे कोई भी हो, बड़े पदों पर बैठे हुए नेता चाहे जो भी हों वो धर्म का नाम लेकर अपना हित साधने में कभी भी पीछे नहीं हटते हैं. जनता की धार्मिक पहचान या सही मायनों में धार्मिक कमजोरी को भुनाने का खेल बदस्तूर जारी है और उम्मीद यही है कि ये कभी ख़त्म नहीं होगी.
कई कमजोर कर देने वाले धार्मिक मुद्दों में से एक मुद्दा है राम मंदिर का मुद्दा. राजनितिक रूप से इसे भारत का सबसे बड़ा बांटने वाला मुद्दा कह सकते हैं. जिस मुद्दे को भारत के राजनितिक दल आपसी भाईचारे को बढाने वाला मुद्दा के रूप में तब्दील कर सकते थे, उसे आज तक नेताओं कभी हल करने या करवाने की जरूरत नहीं समझा. सत्ता पाने की लालच में इस मुद्दे को जिन्दा रखा गया है. पीढियां गुजर रही हैं पर मुद्दा ज्यों का त्यों बना हुआ है. चुनाव आते ही इसमें नये-नये दृष्टिकोण जुड़ने लगते हैं, नयी-नयी बहसों को नए सिरे से शुरुआत कराया जाता है.
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साल 2019 नजदीक है और हम फिर से इसपर खुल कर राजनीति होते देख सकते हैं.
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